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अंतरात्मा जिसे स्वीकारे वह धर्म, जिसका तिरस्कार करे अधर्म है: स्वामी महेश आश्रम

प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार ) । धर्म एक बड़ा विषय है इसकी व्याख्या भी बृहद है। लेकिन आसान शब्दों में धर्म की परिभाषा यह है कि अंतरात्मा जिसे स्वीकारे वही धर्म है और जिसका तिरस्कार करे वही अधर्म है। पृथ्वी पर जब धर्म की हानि होती है और असुर व अभिमानी बढ़ते हैं तब धर्म के उत्थान के लिए भगवान मनुष्य के रूप में अवतरित होते हैं। मत्स्य, वराह, परशुराम और राम के रूप में भगवान ने धर्म के उत्थान के लिए ही जन्म लिया। यह बातें शंकराचार्य स्वामी महेश आश्रम ने माघ मेला स्थित अपने नागेश्वर धाम शिविर में भक्तों को कथा सुनाते हुए कही। शंकराचार्य जी ने कहा कि सामान्य मनुष्य के लिए धर्म के बृहद अर्थ को समझना कठिन है, उसे सिर्फ इतना ही जानना पर्याप्त है कि जिन कार्यों को करने से खुद की अंतरात्मा प्रसन्न होती है वही धर्म है और जिस कार्य को करने से अंतरात्मा कचोटती है, धिक्कारती है वही अधर्म है।

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