गंगा तट से

माघ मास के मंगलवार को खास तौर पर करें उपासना, होगी पुरुषार्थ की प्राप्ति

भारतीय उपासना में जिस प्रकार वैशाख स्नान एवं कार्तिक स्नान का महत्व है उसी प्रकारमाघ स्नान का महत्व तो निराला ही है। बारह महीनों में जिस प्रकार बसंत को ऋतुराज एवं श्रावण को ऋतुओं की रानी कहा जाता है उसी प्रकार माघ को महीनों का महात्मा कहा गया है।
माघ के महीन में धर्म प्राण लोग इस कड़ाके की सर्दी में गंगा-यमुना आदि नदियों में पूरे महीने प्रातः स्नान कर के ही देवार्चना करते हैं। मकर संक्रांति से ही माघ मास के धार्मिक कार्यक्रमों की धूम शुरू हो जाती है।
माघ मास में मंगलवार उपासना का शास्त्रों में विशेष महत्व बताया है। जिसके करने से धर्मार्थकाम मोक्ष चारों पुरुषार्थों की सहज प्राप्ति तो होती ही साथ ही लौकिक सुख-सुविधाओं का भी अम्बार लग जाता है।
प्रत्येक वर्ग जाति के सनातन वैदिक धर्मावलम्बी इस महीने अपने आहार को अत्यंत सात्विक कर देते हैं। यहां तक कि लहसुन, प्याज एवं मसूर की दाल का भी परित्याग कर उड़द की खिचड़ी का भोग प्रसाद ग्रहण कर उपासना करते हैं।
माघ में स्नान के साथ-साथ मंगलवार के व्रत किए जाते हैं। जिसमें उपासना करने वालों को एक समय बिना नमक का आहार लेना चाहिए। गुड़ तिल मिला कर अपने आराध्य को भोग लगाना चाहिए तथा उसे प्रसाद स्वरूप ग्रहण करना चाहिए, जरूरतमंद एवं समाज के असहाय लोगों को अन्न एवं गरम वस्त्रों का दान करना चाहिए। इस प्रकार दान करने से पुण्य के साथ-साथ नर सेवा नारायण सेवा का भी उदान्त भाव समाज में फैलता है।
भारतीय संवत्सर का ग्यारहवां चन्द्रमास और दसवां सौरमास माघ कहलाता है। इस महीने में मघा नक्षत्रयुक्त पूर्णिमा होने से इसका नाम माघ पड़ा। धार्मिक दृष्टिकोण से इस मास का बहुत अधिक महत्व है। इस मास में शीतल जल के भीतर डुबकी लगाने वाले मनुष्य पापमुक्त हो स्वर्ग लोक में जाते हैं – ‘माघे निमग्नाः सलिले सुशीते विमुक्तपापास्त्रिदिवं प्रयान्ति।’
पद्मपुराण में माघ मास के माहात्म्य का वर्णन करते हुए कहा गया है कि पूजा करने से भी भगवान श्रीहरि को उतनी प्रसन्नता नहीं होती, जितनी कि माघ महीने में स्नान मात्र से होती है। इसलिए सभी पापों से मुक्ति और भगवान वासुदेव की प्रीति प्राप्त करने के लिए प्रत्येक मनुष्य को माघ स्नान करना चाहिए। –  ‘प्रीतये वासुदेवस्य सर्वपापानुत्तये। माघ स्नानं प्रकुर्वीत स्वर्गलाभाय मानवः॥’
महाभारत में आया है माघ मास में जो तपस्वियों को तिल दान करता है, वह नरक का दर्शन नहीं करता। माघ मास की द्वादशी तिथि को दिन-रात उपवास करके भगवान माधव की पूजा करने से उपासक को राजसूय यज्ञ का फल प्राप्त होता है। अतः इस प्रकार माघ स्नान की अपूर्व महिमा है। इस मास की प्रत्येक तिथि पर्व है। यदि असक्त स्थिति के कारण पूरे महीने का नियम न निभा सके तो शास्त्रों ने यह भी व्यवस्था दी है कि तीन दिन अथवा एक दिन माघ स्नान का व्रत का पालन करें। –  ‘मासपर्यन्तं स्नानासम्भवे तु त्र्यहमेकाहं वा स्नायात्‌।’
माघ मास में पूर्णिमा को जो व्यक्ति ब्रह्मावैवर्तपुराण का दान करता है, उसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि माघ में ब्रह्मवैवर्तपुराण की कथा सुननी चाहिए यह संभव न हो सके तो माघ महात्म्य अवश्य सुनें। अतः इस मास में स्नान, दान, उपवास और भगवान माधव की पूजा अत्यंत फलदायी होती है। माघ मास की अमावास्या को प्रयागराज में स्नान से अनंत पुण्य प्राप्त होते हैं। वह सब पापों से मुक्त होकर स्वर्ग में जाता है।

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