बदस्तूर गंगापार इलाके में जारी नृंशंस हत्यायों का सामूहिक दौर

(राजेश सोनकर )प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार )। बदस्तूर गंगापार इलाकों जारी है सामूहिक हत्याकांडों का सिलसिला, गंगापार में सामूहिक हत्याकांड की घटनाएं कोई नई नहीं हैं, पहले भी नरसंहार की वारदातों को अंजाम देकर खूनी श्रृंगार करते रहे हैं मानवता के दुश्मन। वर्ष 2017 से शुरू हुआ खूनी खेल आज भी खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। पिछले वर्ष नवंबर महीने में फाफामऊ क्षेत्र के एक गांव में पति-पत्नी और बच्चों को सामूहिक रुप से कुल्हाड़ी काट डाला गया था, मारने काटने से पहले एक युवती के साथ सामूहिक बलात्कार भी किया गया था,गांव के ही एक परिवार के 11लोगों के खिलाफ पुलिस ने मुकदमा नामजद कर जेल भेजा था। 23 अप्रैल 2017 को थाना नवाबगंज के शहावपुर नामक गांव निवासी मक्खन लाल गुप्ता और उनकी पत्नी मीरा देवी, बेटियां वंदना व निशा की सामूहिक रूप से हत्या कर दी थी,मार्च 2017 में ही थरवई के पड़िला महादेव मंदिर के पास हर वर्ष लगने वाले शिवरात्रि मेले के दौरान राजस्थान से प्रयागराज दर्शन को आये एक दम्पत्ति व बेटी को जिंदा जलाकर मार दिया गया था। 19 मार्च 2018 में पुन: नवाबगंज में शहावपुर उर्फ पसियापुर गांव निवासी सुशीला देवी और उसके दो बेटों सुनील और अनिल की हत्या कर दी गई थी।
7 सितंबर 2018 को सोरांव क्षेत्र के बिगहिंया गांव में सरकारी कर्मचारी कमलेश देवी,उनकी बेटी और दामाद समेत नाती को भी मौत की आगोश में सुला दिया गया था। थाना व तहसील सोरांव के ही युसुफपुर गांव में वर्ष 2020 विजय शंकर तिवारी,और उसकी बीवी सोनी बच्चों कान्हा,कुंज,कुल मिलाकर पांच लोगों के सामूहिक नरसंहार ने एक बार फिर से गंगपार के लोगों को हिलाकर रख दिया था। 2 जुलाई 2020 को थाना होलागढ़ अन्तर्गत बरई हरख गांव मे चार लोगों विमलेश पांडेय, बेटे प्रिंस बेटी श्रेया व शीबू की भी धारदार हथियारों से गला रेतकर मौत के घाट उतार दिया गया था। सामूहिक हत्यायों का सिलसिला और उसकी पुनरावृत्ति में कोई गिरावट नहीं आयी बल्कि ग्राफ बढ़ता ही जा रहा है। आखिर क्यों ऐसा घिनौना और अमानवीय व जघन्य कृत्य किन लोगों के द्वारा किया जा रहा है ये अपने आप में एक बड़ा और ज्वलंत सवाल है।
यहां एक बात गौरतलब है कि गंगापार के इलाकों में निरंतर हो रहीं सामूहिकरूप से दिल दहला देने वाले हत्याकांडों में किसी भी प्रकार के देशी कटटे और न ही विदेशी रिवाल्वर या गोली बम बारूद का इस्तेमाल किया गया सिर्फ और सिर्फ लोहे के बने धारदार हथियारों चापड़ कुल्हाड़ी चाकू,छूरी का इस्तेमाल किया गया था सभी वारदातों में एक थ्योरी अपनाई गई है,यानि आदिमानवकाल की तर्ज वे आदिमानव अथवा आदिवासी जंगलों में रहने के कारण जंगली रवैया अपनाते थे जानवरों और इन्सानों दोनों का ही आखेट करके अपनी क्षुधा शांत करते थे अपने देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए भी ऐसा करते थे। यहां इस बात का संक्षिप्त उल्लेख बहुत ही जरूरी था। क्योंकि सामूहिक नरसंहारों के पर्दाफाश में जुटी पुलिस विभाग की स्पेशल फोर्स की टीमें और आलाधिकारी यही मानते हैं कि गंगापार या किसी भी जिले अथवा राज्य आदिवासियों का घुमंतू गिरोह सक्रिय हैं भले ही आज के दौर में उनकी वेशभूषा और पहनावा रहने के रंग ढ़ंग में थोड़ा बदलाव हो गया है लेकिन मानसिकता वही पुरानी है किसी भी नरसंहार में लूटपाट नहीं की गई है सिर्फ सामूहिक हत्यायें की गई हैं वह भी एक दो नहीं बल्कि पूरे परिवार का सफाया किया गया है। महिलाओं युवतियों के साथ बलात्कार किया गया है उन्हें और उनके आशियानों को आग के हवाले किया गया है ये काम किसी साधारण आम आदमी का नहीं बल्कि आदिवासियों का ही है। एक संक्षिप्त जानकारी के अनुसार जिस पर अमल करके हम खुद व समाज को सुरक्षित रख सकते हैं,बस थोड़ी सी सावधानी कड़ाई एवं समझदारी जरूरी है। अब तक कि पुलिसिया छानबीन के दौरान यह बात सामने उभरकर आयी है कि बिना किसी मकसद के अकारण छैमार गिरोह लोग ही बलात्कार और सामूहिक हत्यायों को अंजाम देते हैं कैसे?और क्यों आइये जानते हैं।
आज का युग भले आधुनिक हो गया हो इंसान जमीं से चांद की सैर कर आया हो लेकिन समाज में फैले असमाजिक और अमानवीय कृत्य को अंजाम देने में माहिर हैं आदिवासी जिनकी मानसिकता संकीर्ण व विकीर्ण हैं सामाजिक उसूलों के उलट हैं इनके हैवानियत भरे कारनामे तत्परता से जुटी एसटीएफ की छानबीन जांच पड़ताल के दौरान ये पता लगाया है कि केवल छैमार गैंग के लोग ही संयुक्तरूप से बिना किसी मकसद के मौत के नंगे तांण्डव को अंजाम देते हैं किसी भी परिवार की सामूहिक हत्या करना बलात्कार करना इनका मुख्य उद्देश्य होता है,इस सबके पीछे छुपी हैं इनके कबीले के रस्म ओ रिवाज की खूंखार और अंधविश्वासी मान्यताएं इस गिरोह की 12 उपजातियां होती हैं जो देश के कोने-कोने में फैली हुई हैं, और 36 भागों में विभाजित हैं किसी भी घटना को अंजाम देने से पूर्व सबसे पहले इस गिरोह के सदस्य तो नहीं कह सकते हां हैवान मां काली को प्रसन्न करने के लिए पूजा करते हैं और जब अपने मकसद और मंसूबे में कामयाब हो जाते हैं तो वारदात के बाद अलग-अलग दिशाओं से रेलवे स्टेशन पहुंकर ट्रेन पकड़कर नौ दो ग्यारह हो जाते हैं। इसके बाद मुख्य अडडे यानि अपने कबीले में पहुंचकर सभी एक स्थान पर एकत्रित होते हैं। सामूहिक हत्याकांड को अंजाम देने की खुशी में मां काली की अपने कुलदेवता की पूजा आराधना करते हैं जानवरों की बलि दी जाती है जिसे प्रसाद के रूप में गिरोह के सभी लोग ग्रहण करते हैं रात रात भरशराब का दौर चलता है साथ नृत्य व गाना बजाना भी करते हैं इस गिरोह के हैवान ऐसी खुशी और जश्न मनाते हैं जैसे बड़ा ही पुनीत और पावन काम करके आये हैं।
साथ ही मजार पर भी चादर चढ़ाते हैं, उत्तर प्रदेश के बहराइच और संभल जिलों में इनका निवास है।
छैमार गिरोह के सदस्य आतंकवादी संगठनों की तरह काम करते हैं जिस घर परिवार को इन्हें अपना निशाना बनाना होता है उस घर की रेकी करके अपने बास को खबर करते हैं उसे पूरी जानकारी से अवगत कराते हैं।
सबसे हैरतअंगेज बात यह है कि छैमार गैंग का बास (मुखिया) बनने के लिए इस गैंग के उस शख्स को हीरो बनने के लिये कम से आधा दर्जन लोगों की हत्यायें करनी पड़ती हैं। हत्यायें भी कोई साधारण तरीके से नहीं बल्कि हैवानियत के साथ के साथ जिस घर परिवार के सदस्यों की रेकी कर सम्पूर्ण जानकारी एकत्रित कर ली जाती उस परिवार के लोगों को धारदार हथियारों से एक-एक करके काट काट बड़ी बेरहमी के साथ मौत की नींद सुला दिया जाता है, खूनी मंजर ऐसा कि देखने वालों की रूहें कांप जाती हैं,शरीर का एक एक रोंया खड़ा हो जाता है। नृशंस तरीके से हत्या करने इनकी शान कहलाता है जो जितना खूंखार ढ़ंग हत्यायों को अंजाम देता उसे उतना ही सम्मान कबीले वाले देते हैं यानि वह शैतान शूरवीर और राजकुमार कहलाता है, ऐसे हैवान की कबीले की सबसे सुंदर युवती से विवाह कर दिया जाता है, सिर्फ इतना ही नहीं लूटपाट का पूरा सामान भी उसी युवती को दे दिया जाता है। यही कारण है कि राजकुमार बनने की चाह में छैमार गैंग के सरफिरे युवा ऐसे दिल दहला देने वाले जघन्य अपराध को अंजाम देने में जरा भी नहीं हिचकते। और घटना को अंजाम देने के बाद रातों-रात अपना डेरा बदल देते हैं। उक्त गिरोह से जुड़े 350 से भी ज्यादा खूंखार लोग देश प्रदेश के अनेकों जेलों बंद सजा काट रहे हैं।




