दोनों दलों की फटकार ने प्रदेश में भाजपा-कांग्रेस के सांसद-विधायकों की भी उड़ा रखी नींद?

(संजय शुक्ला )भोपाल ( अनुराग दर्शन समाचार )। नगर सरकार के चुनावों की मतदान की तिथि जैसे-जैसे करीब आ रही है। प्रदेश के कांग्रेस और भाजपा के सांसद, विधायकों की पेशानी पर चिंता की लकीरें गहरी हेाती जा रही हैं। खासकर विधायकों को संगठनों की ओर से जारी फरमान ने खासी उलझन में खड़ा कर दिया है। वे इन चुनावों में दिन रात एक कर रहे हैं, ताकि उनके विधानसभा क्षेत्र में पार्षद पद के प्रत्याशियों को विजयश्री मिल सके। दरअसल, भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों ने अपने विधायकों को सापु कह दिया है कि उनके क्षेत्र में पार्षद प्रत्याशियों को मिलने वाली जीत ही उनका राजनीतिक भविष्य तय करेगी। इस फरमान ने विधायकों की नींद उड़ा दी है। मैँ पार्षद के अधिकांश टिकट विधायकों की राय पर ही दिए जाते हैं। विधायकों का अपने क्षेत्र की नगरपालिकाओं और नगर परिषद के टिकटों पर सीधा दखल होता है। संगठन में उनकी सुनी भी और उनके हिसाब से ही अधिकांश टिकट बांटे। अब तक टिकट दिलाने वाले इन विधायकों को जितोन का इतना बड़ा फरमान नहीं सुनाया जाता था पर इस बार सत्ताधारी दल भाजपा ने सांसद और विधायकों से सापु कह दिया है कि वे सब काम छोड़ पार्षद प्रत्याशियेां को जिताने के लिए मेहनत करें। चुनाव परिणाम से ही उनकी क्षेत्र में सक्रियता और लोकप्रियता का आकलन होगा। प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा ने पिछले दिनों सभी सांसद और विधायकों के साथ वर्चुअल बैठक कर उन्हें संगठन की मंशा से अवगत करा दिया है। भाजपा ने विधायकों को जो संदेश दिया है उसके निहितार्थ साफ है कि जिस विधायक के क्षेत्र में पार्टी ने बेहतर प्रदर्शन नहीं किया आगामी विधानसभा चुनाव में उसका टिकट खतरे में पड़ सकता है। कांग्रेस भी इस मामले में भाजपा से पीछे नहीं है। उसने भाजपा से एक कदम आगे जाकर फैसले लिए हैं। कांग्रेस ने जिन क्षेत्रों में उसके विधायक हैं यहां पूरे टिकट उनकी मर्जी से दिए हैं इसके साथ ही उसने इन विधायकों पर जीत की जिम्मेदारी भी थोप दी है। पार्टी के प्रदेश प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ ने इन विधायकों से साफ कहा है कि जो टिकट दिला रहे हैं वे जिताने की भी जिम्मेदारी लें। ऐसा ही पार्टी ने उन नेताओं के साथ भी किया है जो विधायक नहीं हैं पर टिकट उन्होंने अपने समर्थकों को दिलाए हैं। कांग्रेस ने इसके लिए एक परिपत्र भी जिलों को चुनाव से पहले ही भेज दिया है। इस परिपत्र को नेताओं को भरकर प्रदेश संगठन को भेजना होगा। इसमें इस बात का उन्हें उल्लेख करना होगा कि उन्होंने कितने लोगों का टिकट दिलाया था, उसमें कितेन जीते। इसके अलावा जरे जरीे उन्हें कितने मत मिले हार-जीत का अंतर कैसा रहा। इसका भी लिखित हिसाब किताब पार्टी संगठन को भेजना होगा। कांग्रेस ने भी अपने विधायकों से साफ कह दिया है, उनके द्वारा भेजे गए डिटेल के आधार पर ही अगले चुनाव में उनके टिकट पर फैसला किया जाएगा। यह पहली बार हो रहा है जब दोनों राजनीतिक दलों ने विधायकों पर जिम्मेदारी थोप दी है। अब तक विधायक टिकट दिलाने में तो महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते थे पर हार के बाद उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं होती थी। दरअसल दोनों दलों ने इस फरमान के जरिए विधायकों पर दबाव बनाने की कोशिश की है ताकि संगठन ने अपनी मर्जी से जिनके टिकट तय किए हैं। विधायक उनकी उपेक्षा ना कर सकें।


