आतंकवाद के मसले पर एक राय कायम रखे सभी राजनीतिक पार्टियां- महंत बजरंगमुनि उदासीन

वेब डेस्क। श्री मीता दास उदासीन आश्रम ठेकमा , आजमगढ़ के महंत बजरंगमुनि उदासीन ने कहा कि मुंबई आतंकी हमले को आज भी कोई भुला नहीं पाया है। 26/11 की आतंकी हमला
भारत के ऊपर अब तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला था जिसने मुंबई और पूरे देश को दहशत में डाल दिया।

महंत बजरंगमुनि उदासीन ने कहा कि एक तरफ निर्दोषों की निर्मम हत्या का दुख है तो वहीं हमले के मास्टरमाइंड के आज तक पकड़े नहीं जाने का गुस्सा भी।

आतंकवादियों की रक्त-पिपासा से देश का कोई हिस्सा अछूता भी नहीं रह गया है। इस दौरान उन्होंने सेना की छावनियों, वायु सेना बेस, धार्मिक स्थलों, तीर्थयात्रियों और अदालत तक को नहीं बख्शा। पिछले हफ्ते अमृतसर के पास निरंकारी सत्संग पर हमला बोल उन्होंने एक बार फिर हमारी राष्ट्रीय अस्मिता को चुनौती दी है। क्या यह शर्मनाक नहीं कि हम कश्मीर की समस्या तो हल नहीं कर पाए, उल्टे पंजाब में पुन: आतंकवाद की चिनगारियां फूटती देख रहे हैं?
हमारे यहां के बड़बोलों के पास इस व्याधि का रामबाण इलाज है। वे शेखी बघारते हैं कि पाक पर हमला कर उसके इरादों को सदा-सर्वदा के लिए जमींदोज कर दिया जाए। यह बात सुनने में जितनी अच्छी लगती है, दरअसल उतनी प्रभावी नहीं है। कश्मीर के कबाइली हमले से कारगिल तक का इतिहास गवाह है कि पड़ोसी ने जब भी हमला किया, उसे मुंह की खानी पड़ी।
1971 में तो इंदिरा गांधी ने उसे दो टुकड़ों में ही बांट दिया था, पर नतीजा क्या निकला? पाक ने समझ लिया, हम सीधी लड़ाई में हिन्दुस्तान को नहीं हरा सकते। पिछले चार दशक से वह ‘छद्म युद्ध’ के सहारे हमारा खून बहा रहा है। हमारे हमलावर हमेशा से ऐसा करते आए हैं।
भारत एक विशाल देश है।
यहां दिल्ली और सूबाई राजधानियों में अक्सर अलग-अलग विचारधाराओं की सरकारें बनती हैं। यह जरूरी नहीं कि उनके विचार मेल खाते हों, परंतु राष्ट्रभक्ति की भावना भी क्या अलग-अलग हो सकती है? जिस संविधान की शपथ लेकर हमारे हुक्मरां सिंहासनों पर विराजते हैं, वह तो एक ही है। और किसी मामले में न सही, कम से कम आतंकवाद के मसले पर वे एक राय कायम कर सकते हैं? अफसोस, इसका उल्टा हो रहा है।।
मुंबई हमले के 10 साल गुजरने के बाद भी अगर देश के आम आदमी की टांगें दहशत से कंपकंपाती हों, तो उसके वोट से राज करने वालों को अपनी कथनी और करनी का आकलन जरूर करना चाहिए।
महंत बजरंगमुनि उदासीन ने कहा हैं कि मैदानी जंग तो सिर्फ बहाना होती है। असल हार-जीत का फैसला तो टेबल पर आमने-सामने बैठकर किया जाता है। हर युद्ध के बाद अगर सुलह-सफाई करनी ही है, तो क्यों न पहले ही कर ली जाए?


