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आधुनिक राजनीति का मंत्र-स्वार्थ या परमार्थ-महंत बजरंगमुनि उदासीन

प्रयागराज। श्री मीता बाबा उदासीन आश्रम ठेकमा के महंत बजरंगमुनि उदासीन ने एक विशेष चर्चा में बताया कि
आधुनिक भारत की राजनीति देश के प्रति समर्पित न होकर परिवार और स्वयं तक ही सीमित हो चुकी है अतः ये सिर्फ निजी स्वार्थ और हित की राजनीति ही है।


राजनीति एक सम्पूर्ण व्यवस्था कहलाती हैं, जिसका मूल उद्देश्य लोकहित होता हैं और जिसकी सफलता जनता की खुशहाली पर निर्भर करती हैं। राजनीति में जनता एक सेवक का चुनाव करती है ऐसा सेवक जिसे नेता कहा जाता है, जो जनता की हर समस्या से परिचित हो, उसके और जनता के मध्य कोई राज न हो।

पारदर्शिता इस व्यवस्था का एक मूल अंग होता हैं। जब शासक अपने सहयोगियों के हर कार्य और राज से परिचित होता हैं तो वो सफल रहता हैं। लेकिन यह सभी बाते सिर्फ परिभाषित करने मात्र ही हैं, जिसका आज हकीकत से कोई वास्ता नहीं है। आज किसी भी नेता के लिए राजनीति का मतलब चुनाव जीत कर सत्ता की कुर्सी तक पहुँचाना हैं और फिर 5 सालों तक जितना हो सके जनता के पैसे से अपना हित करना हैं।

आज के नेता सेवक नहीं शक्ति में मदहोश अकुशल राजा बन गए हैं, जो अपना कर्तव्य भूल चुके हैं। आज चारो तरफ सिर्फ मतलबी राजनीति है। राजनीति, कहीं वोट की तो कही नोट की, कहीं जाति की तो कहीं धर्म की, कहीं क्षेत्र की तो कहीं देश की, कही प्यार में राजनीति तो कही नफरत में राजनीति, कहीं दोस्ती में राजनीति तो कहीं दुश्मनी में राजनीति, कहीं गाँव की तो कहीं शहर की, कहीं अपनो की तो कहीं परायों की, पर कहीं न कहीं राजनीति तो हो रही है। कहने का तात्पर्य, राजनीति शब्द का क्षेत्र जितना व्यापक है उतना ही संकुचित भी। तभी तो एक बाप अपने बेटे से निःसंकोच यह कहता है, बेटा, अपने बाप से ही राजनीति कर रहे हो? प्रदेश हो या देश, गाँव हो या शहर, घर हो या कार्यालय, चाय की दुकान हो या पान की, बस स्टैंड हो या रेलवे प्लेटफार्म, प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रोनिक मीडिया, खबरीलाल हो या वेब की दुनिया, इस समय चारों तरफ एक ही शब्द का जिक्र है राजनीति। यहाँ सुनने, देखने, और महसूस करने के साथ-साथ उठते-बैठते, जागते-सोते, यहाँ तक कि खाने और पीने में भी सिर्फ राजनीति है।

जातिए क्षेत्र, भाषा इत्यादि, जब तक सामाजिक व्यवस्था का अंग था तब तक सब ठीक था। परन्तु अब यह राजनीतिक व्यवस्था का अंग होता जा रहा है तो भाई, यह उठक-बैठक क्यों? राजनीति न ही कोई आकाश से उतरी हुई कोई व्यवस्था है और न ही राजनेता आकाश से उतरे कोई राजदूत। यह राजनीति भी अपनी है और राजनेता भी हममे से कोई एक तो फिर यह एक दुसरे पर दोष कैसा लगाना? यह भी तो एक राजनीति ही हुई न! अब तो आलम यह हो गया है कि जहां भी राजनीति का जिक्र होता है वहां अपने आप भ्रष्टाचार भी मुंह खोल लेता है और यह स्पष्ट कर देता है की राजनीति और भ्रष्टाचार का तो चोली दामन का साथ हैं, जिसे अलग नहीं किया जा सकता है ।

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