जय सिया राम का अर्थ है, सत्य, प्रेम और करुणा – मोरारी बापू

अक्षयवट की बताई महिमा, विभिन्न रूपों का कराया अर्थ बोव्यासपीठ के समक्ष निःशुल्क सामूहिक विवाह आज, 80 से अधिक जोड़े बनेंगे एक दूसरे के हमराही “मानस अक्षयवट” का सातवां दिन राम नामकरण की सुनाई कथा

प्रयागराज ( अनुराग शुक्ला ) । अरैल में चल रही मोरारीबापू की राम कथा “मानस अक्षयवट” के सातवें दिन शुक्रवार को भी पांडाल में भक्ति और प्रेम का ज्वार उमड़ा। बड़ी संख्या में श्रोता मोरारीबापू के मुख से राम कथा श्रवण को पहुंचे। संत कृपा सनातन संस्थान, नाथद्वारा की ओर से आयोजित राम कथा में मोरारीबापू ने प्रेम रूपी अक्षयवट के तने, शाखाओं, टहनियों और फल के रूप को विस्तार से बताया। बापू ने कहा कि प्रेम रूपी अक्षयवट का तना महामंत्र है। प्रेम महामंत्र है। मानस की दृष्टि में शिव ने जिस मंत्र का गान किया वह राम नाम है। वाल्मीकि जी कहते हैं यह महा मंत्र है। जिस प्रकार से फल के बीज से नया वृक्ष पनपता है, उसी प्रकार प्रेम की कोंपले, बीज मंत्र यानी महामंत्र से फूटती है। प्रेम से परमात्मा प्रकटता है और परमात्मा के नाम से प्रेम प्रकटता है।
तना, शाखाओं, टहनियों के ये बताए अक्षय रूप-
“मानस अक्षयवट” के दौरान बापू ने प्रेम रूप अक्षयवट की व्याख्या करते हुए बताया कि प्रेम अक्षयवट का तना धीरता और वीरता है। जो धैर्य नहीं रख सकता है वह प्रेम नहीं कर सकता है। मेरे प्रेम को सम्मान नहीं दिया जा रहा, ऐसा बोलने वाला तने की तरह मजबूत प्रेम नहीं कर सकता है। प्रेम तो वीर कर सकता है, जो यह सोचे बिना प्रेम करे कि लोग क्या कहेंगे, जिसे किसी का भी डर नहीं है। बापू ने कहा कि वात्सल्य, स्नेह, राग, अनुराग, भक्ति, प्रणय, आसक्ति और रीति प्रेम की शाखाएं है जिस से होते प्रेम आगे बढ़ता है। बड़ों का छोटो के प्रति वात्सल्य, स्नेह, प्रभु के प्रति भक्ति प्रेम की शाखाएं हैं। बापू कहते हैं कि संकेत प्रेम की टहनियां हैं। मुद्राएं, नयन नृत्य भी टहनी का ही रूप है। बापू ने कहा कि चंचलता, व्याकुलता, कम्पन्नता, स्तंभता अक्षयवट के पत्ते है, किसी चीज़ को लेकर चैन न आए, व्याकुलता रहे, कम्पन्नता रहना ही अक्षयवट का पर्ण है। बापू ने कहा कि सूक्ष्म तरंग और अविरल छाव और हर मौसम प्रेम ही प्रेम रूपी अक्षयवट का प्रेम है।

वटवृक्ष की अपनी महिमा, देश में तीन और प्रमुख वट-
“मानस अक्षयवट” में मोरारीबापू ने अक्षयवट के अलावा तीन और उन वट वृक्षों के बारे में बताया जो वैदिक संस्कृति से महत्वपूर्ण है। बापू ने बताया कि मेरी नज़र में जहां तुलसीदास जी ने अपने गुरु से राम कथा सुनी, उस वराह क्षेत्र में स्थित गृद्ध वट भी महत्वपूर्ण है। यहां भगवान वराह ने पृथ्वी को उपदेश दिया था। गृद्ध वट की महिमा भी अक्षय है। दूसरा स्वयं अक्षयवट है। तीसरा मथुरा का वंशीवट और चौथा गया का वटवृक्ष है। कुरुक्षेत्र के निकट ज्योतिसर नामक स्थान पर मौजूद वट वृक्ष की भी अपनी महिमा है, बताया जाता है यह वट वृक्ष भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा अर्जुन को सुनाई गई भगवतगीता का साक्षी है।
अक्षयवट के गिनाएं नाम, अक्षय का बताई महिमा
राम कथा के दौरान मोरारीबापू ने अक्षय नाम से जुड़े प्रमुख तिथियों, शब्दों को बताते हुए उनकी व्याख्या की। बापू ने कहा कि अक्षयपात्र की अपनी महिमा है, जिसमें भोजन कभी खत्म न हो वह अक्षयपात्र है। बापू ने तिथियों को बताए हुए कहा कि सोमवती अमावस्या, रविवारीय सप्तमी और मंगलवार की चतुर्थी भी अक्षय है। इसी तरह समस्त कर्म जल जाने पर साधक की जो स्थिति होती है वह अक्षय स्थिति है। वाक सिद्धि अर्थात बोले और निहाल हो जाए, अक्षय वचन और अखंड वाणी प्रवाह जहां चले, वह अक्षयवट है। अर्जुन का तूणीर अक्षय है, जिसमें बाण कभी खत्म नहीं होते थे। बिना पंडित को पूछे जो मंगल तिथि है वह अक्षय तृतीया है। मंगल काम की हर वेला अक्षय है। कार्तिक महीने की शुक्ल नवमी के दिन बेटियां वट की पूजा करती है, यह नवमी अक्षय है।

जय सिया राम का अर्थ है, सत्य, प्रेम और करुणा
मोरारीबापू ने कहा की जय सिया राम का मेरी नज़र में अर्थ सत्य, प्रेम और करुणा है। क्योंकि कहा गया है कि सत्यमेव जयते अर्थात जो सत्य है उसी की जय है। जय सत्य है, माँ जानकी प्रेम का स्वरूप है और राम करुणा है। बापू कहते हैं कि परम सत्य की महिमा अलग है। जहां अंगुली उठे वहां प्रेम नहीं है। शून्य ही प्रेम है। सत्य ही अक्षयदान है। प्रेम ही अक्षय दान है। करुणा जितनी लुटाओ, भरपूर रहेगी। कृष्ण परम सत्य है।
साधु का बताया परिचय, जो भेद न करें वो साधु
कथा के दौरान मोरारीबापू ने साधु का परिचय बताते हुए कहा कि जो भेद न करे वो साधु है। किसी को देखकर शास्त्र स्वाध्याय हो जाए वह साधु है। जो जैसा बोलता है वैसा ही वर्तन करे या फिर वर्तन कर फिर बोले, तो वो साधु है। जो प्रेम मूर्ति है वह साधु है। बापू कहते हैं कि किसी से भेद मत करना, संत माफ़ कर देगा लेकिन भगवंत माफ नही करेगा।
दलित की पढ़ी चिट्टी, कहा, भोजन बनाकर लाओ, मैं खाऊंगा-
इस अवसर पर बापू ने एक श्रद्धालु की चिट्ठी का उल्लेख करते हुए बताया कि उसने खुद को अतिदलित बताते हुए उसके घर से भिक्षा लेने की बात कही, इस पर बापू ने उसको भोजन बनाकर परिवार सहित पांडाल आने का न्योता दिया। बापू ने कहा कि जो दूसरे को हल्का समझे, उसके समान दूसरा कोई हल्का है ही नहीं। बापू कहते हैं कि व्यक्ति को किसी के साथ किसी भी तरह का भेदभाव नहीं करना चाहिए। बापू कहते हैं कि बीच में हम लड़खड़ा गए, जिसका फल अब भोग रहे हैं। सभी में एक ही परमात्मा है, जो हरि नाम भजे, उसमें क्या भेद। कथा के दौरान बापू ने कहा कि कुछ लोग धर्म का ठेका लेकर बैठे हैं। कहते हैं धर्म भ्रष्ट हो गया है। जो ठेका लिए हुए बैठे हैं वे ही धर्म भ्रष्ट है। मेरा वर्ण प्रेम है। बापू ने कहा कि जो अज्ञानी है फिर भी ग्रंथ का पाठ करता है, खूब है। यह ज्ञान का दावा करने वालो से बेहतर है। मानस को समझने की जरूरत नहीं, पाठ करो। बापू कहते हैं कि ज्यादा श्रेष्ठ है कि ग्रंथ को धारण करो। जो सुना है उसे समझकर किसी के प्रति भेदभाव न करो।
राम नामकरण की सुनाई कथा, भक्त हुए भाव विभोर-
राम कथा के दौरान मोरारीबापू ने भक्तों को राम के नामकरण की कथा सुनाई। बापू ने कहा कि गुरु वशिष्ठ ने राम का नाम रखते हुए कहा कि जो सबको आराम देगा, सबको विश्राम देगा, वह राम है। जो सबका भरण पोषण करेगा, किसी का शोषण नहीं करेगा, वह भरत है। बापू कहते हैं कि लक्ष्मण से पहले शत्रुघ्न का नाम रखा गया था, शत्रुघ्न के नाम का अर्थ बताते हुए बापू कहते हैं कि जिसके नाम का स्मरण करने से शत्रुता कम होगी, उसका नाम शत्रुघ्न रखा गया और जो शेष है, सब लक्षण का जो धाम है उसका नाम लक्ष्मण रखा गया। लक्ष्मण का नाम सबसे अंत में रखने का बापू यह कारण बताते हैं कि शत्रुता खत्म किए बिना सब लक्षणों को प्राप्त नहीं किया जा सकता है। राम का प्रिय होने के लिए शत्रुता खत्म करना जरूरी है। बापू कहते हैं राम विचारक, उद्धारक और स्वीकारक है।
यह रहे मौजूद
“मानस अक्षयवट” कथा अवसर पर कथा के मुख्य आयोजक मदन पालीवाल, रविन्द्र जोशी, रूपेश व्यास, गोपाल कृष्ण व्यास, मंत्रराज पालीवाल, सतुआ बाबा सहित बड़ी संख्या में संत कृपा सनातन संस्थान से स्वयंसेवक व श्रद्धालु मौजूद थे।
व्यासपीठ के समक्ष निःशुल्क सामूहिक विवाह आज, 80 से अधिक जोड़े बनेंगे एक दूसरे के हमराही
शायद उन्होंने कभी नहीं सोचा होगा कि अरैल का घाट, त्रिवेणी संगम और अक्षयवट की छाव में व्यासपीठ पर श्रीरामचरितमानस मानस को साक्षी मानते हुए कथा मर्मज्ञ विख्यात राष्ट्रीय संत मोरारीबापू के आशीर्वाद से अपने दाम्पत्य जीवन की नई शुरुआत करेंगे। लेकिन यह बात शनिवार की दोपहर को सच हो जाएगी जब 80 से अधिक जोड़े राम कथा पांडाल में एक दूसरे से वैवाहिक बंधन में बंधेंगे। इतना ही नहीं 170 देश टीवी के माध्यम से इस विवाह के साक्षी बनेंगे, साथ ही पांडाल में मौजूद हजारों श्रोता भी वर-वधु को आशीर्वाद देंगे। मौका होगा संत कृपा सनातन संस्थान नाथद्वारा की ओर से आयोजित राम कथा “मानस अक्षयवट” के आठवें दिन का। मोरारीबापू के आव्हान पर होने जा रहे इस सामूहिक विवाह में 75 से अधिक जोड़े शादी के बंधन में बंधने जा रहे हैं। इसमें दलित, वंचित, पिछड़े, नाविकों सहित हर धर्म, वर्ग के युवक युवतियां शामिल है। इन सभी जोड़ों के लिए शादी के कपड़ों से लेकर वरमाला, भोजन प्रसाद तक का समस्त खर्च सन्त कृपा सनातन संस्थान वहन करेगा। साथ ही शादी में आने वाले अतिथियों के लिए विवाह भोज की व्यवस्था भी संस्थान की ओर से रहेगी। कथा के तीसरे दिन मोरारीबापू की ओर से सामूहिक विवाह आयोजित करने की ईच्छा के बाद से ही संस्थान शादी की तैयारियों में जुट गया था। इसके लिए विभिन्न स्तरों पर प्रचार किया जा रहा था। जिसके तहत मात्र 4 दिन में 75 से अधिक जोड़ों का पंजीयन शादी के लिए हुआ।
लगाई मेहन्दी, हर्षोल्लास का रहा माहौल
सन्त कृपा सनातन संस्थान की ओर से होने वाले सामूहिक विवाह को लेकर दूल्हा-दूल्हन के परिजन शादी की तैयारियों में जुटे रहे। शादी को लेकर जोड़ों के घरों पर ही शादी पूर्व के रस्में अदा की गई। दूल्हा – दुल्हन के मेहंदी लगाई गई। जोड़ों के घर पर हर्षोल्लास का माहौल रहा। जोड़ों के घरों पर मंगल गीत गाए गए तो मेहमानों की भी आवाजाही रहे। जहां दूल्हा-दुल्हन खुद को संवारने में व्यस्त रहे तो दूल्हा-दुल्हन के परिजन अपने रिश्तेदारों को शादी का न्यौता देने में लगे रहे। इधर, सामूहिक विवाह को लेकर संत कृपा सनातन संस्थान भी वृहत स्तर पर तैयारियों में लग गया था। दूल्हा-दुल्हन के लिए उनके माप के कपड़े, वरमाला व अन्य सामग्री खरीदने से लेकर जोड़ों के पंजीयन तक का काम 4 दिन के भीतर किया गया था।


