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आदि शंकरचार्य की मूर्ति की स्थापना कार्यक्रम में किसी भी शंकराचार्य को आमंत्रण न देना सनातन धर्म का घोर अपमान

प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार )। आदि शंकरचार्य की मूर्ति की स्थापना और उनके प्रतिनिधि किसी भी शंकराचार्य को आमंत्रण न देना सनातन धर्म का घोर अपमान है। सनातन धर्म के धर्मवर्ली ने बताया खुद को धर्म से ऊपर समझता है । और केवल सनातन धर्म का बेजा इस्तेमाल करता है । इसीलिए इसका आचरण अधर्मी है। आपको ज्ञात होगा कि रामेश्वरम में भगवान शिवलिंग की स्थापना में भगवान राम ने जब संकल्प लिया और आचार्य रावण को स्थापित करने के लिए आमंत्रण दिया । तो आमंत्रण स्वीकार करने के बाद जब रावण चला तो उसे रास्ते में याद आया कि राम की पत्नी तो अशोक वाटिका में कैद हैं । बिना उनकी तो यह पूजा और कर्मकांड हो नहीं सकता । वह वापस जाकर माता सीता को लाया और भगवान राम के साथ गांठ बांधकर पूजा कराया। बिना पत्नी के पूजा हो ही नहीं सकता पत्नी के जीवित रहते मोदी जी की पत्नी भी है । इन्होंने पत्नी के साथ भी विश्वासघात किया और यह पूजा कैसे कर सकते हैं । और पूज्य शंकराचार्यगण जो आदि शंकर के प्रतिनिधि हैं उन्हें नहीं बुलाया गया सनातन धर्म का घोर अपमान है । यह केवल मौलवी और पॉप का पूजा करते हैं । शंकराचार्य का नहीं इनके कर्मो की सजा पूजा भगवान बाबा केदार नाथ जी दे कर रहेंगे और काशी विश्वनाथ मंदिर पर इशिता ने तोड़ी गई प्राण प्रतिष्ठित मूर्तियां इनके पार्टी का नाश करके रहेंगे यह समझ क्या रखे हैं हिंदू धर्म के ऊपर भगवान हैं । यही मुगालते में कम और दुर्योधन भी थे । आज उनके खानदान का भी पता नहीं है। लगता है इनके धार्मिक ज्ञान देने वाले सब अधर्मी है। पढ़ा लिखा आदमी तो ज्ञान प्राप्त करता है।

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