महंत बजरंगमुनि उदासीन: नादान, संकोची, होशियार बालक से साधु बनने का रोचक सफर

आजमगढ़। मेहनत और परिश्रम करके व्यक्ति हमेशा ऊचाई की बुलन्दियो को छूता है। ऐसी कहावत आप देखे और सुने भी होगे लेकिन हम आज आपको ऐसे व्यक्तित्व का परिचय कराने जा रहे है जो साधारण जीवन की मोह-माया को त्याग कर कठिन परिश्रम करके साधू बन गया।

जी हां! हम बात कर रहे है अनुपम मिश्रा की। अब आपके जेहन में ये बात गूंज रही होगी कि आखिर अनुपम मिश्रा है कौन तो हम आपको बता रहे है अनुपम मिश्रा की यह रोचक कहानी…..
यूपी के प्रतापगढ़ जिले के रानीगंज तहसील के पृथ्वीगंज हवाई पट्टी के रहने वाले श्री रामसेवक मिश्रा और श्रीमती कौशल्या देवी के सुपुत्र है।

10 अक्टूबर 1988 को जन्मे अनुपम मिश्रा। अनुपम मिश्रा बाल्यकाल से ही पढ़ाई लिखाई में तेज थे। वैसे तो अनुपम मिश्रा की पैदाइश मध्यप्रदेश के इंदौर में हुई जहां इनके पिता श्री रामसेवक मिश्रा बतौर सब इंस्पेक्टर तैनात थे।
अनुपम मिश्रा दो भाई एक बहन में सबसे छोटे है। जाहिर है छोटे होने के नाते परिवार के सभी सदस्य उन्हें बहुत लाड प्यार से पालपोष कर बड़ा किया।
अनुपम मिश्रा की प्रारम्भिक शिक्षा इंदौर से ही हुई। यौवन की दहलीज पर कदम रखते ही उन्होंने एमए हिन्दी विषय से और उसके बाद बीबीए किया। बीबीए करने के उपरान्त उन्हें नौकरी मिली जेड एयरवेज में।
नियुक्ति तमिलनाडू राज्य के क्योम्बटूर में जेड एयरवेज में बतौर वे स्टोर इंचार्ज के रूप में काम करने लगे। अनुपम मिश्रा के पिता बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति के इंसान है। वे अपने सभी बच्चो को भी धर्म-कर्म से जोड़े रहे। उन्होने बच्चो को भागवत गीता दे रखा था और कहा कि इससे पढ़ा करे इस पुस्तक में सभी समस्याओ का समाधान मिल जाता है।

बच्चे भी पिता के आदेश का अनुसरण कर भागवत गीता को ध्यान पूर्वक पढ़ा करते थे। तो हम बात कर रहे थे अनुपम मिश्रा की जो जेड एयरवेज में बतौर स्टोर इंचार्ज कार्य कर रहे थे।
क्योम्बटूर एयरपोर्ट में इनकी ड्यूटी लगी थी। उस दौरान एयरपोर्ट पर साधू महात्मा पहुंचे और किसी बात से नाराज होकर एयरपोर्ट पर ही उग्र रूप धारण कर हंगामा करने लगे। हंगामे का दृश्य देखकर कोई भी उनके पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। जो उनके पास गया वह महात्मा के गुस्से का शिकार होना पड़ा।
अनुपम मिश्रा अपने पिता से सुने थे कि किसी साधू महात्मा के गुस्से को शांत करना हो तो उनके समझ नतमस्तक हो जाना चाहिए। अनुमप मिश्रा के भी मन में ख्याल आया कि वे महात्मा के शरणो में झुककर माफी मांग ले। सो उन्होने वैसा ही किया और वे महात्मा के सामने दण्डवत प्रणाम की स्थिति में उनके सम्मुख झुक गये लेकिन महात्मा का उग्र रूप जारी रहा।
साधू के कोपभाजन का अनुपम मिश्रा को शिकार होना पड़ा। महात्मा अनुपम को न केवल थप्पड़ बरसाये बल्कि अपने कड़ासे से प्रहार कर घायल कर दिया। लहूलुहान होने के बाद भी अनुपम मिश्रा अपना आपा नहीं खोये और उनको मनाने में जुटे रहे। महात्मा को पानी लेकर दिये किसी तरह घंटो मशक्कत के बाद साधू महात्मा का गुस्सा शांत हुआ। इस दौरान महात्मा अपनी आंखो में अनुपम मिश्रा की छवि को बंसा लिये और फिर यही से शुरू हुई अनुपम मिश्रा के साधू बनने की कहानी……..
जब लाडले को खोजते हुए परिजन पहुंचे आश्रम
नौकरी को छोड़ अनुपम मिश्रा अब पूरी तरह परमपुज्यनीय डा. बिन्दु जी महाराज के सानिध्य में आ गये थे। इस बात की जानकारी जब इनके पिता को हुई तो वे अनुपम के दोस्तो से पूछताछ कर बिन्दु धाम आश्रम पूरे परिवार के साथ पहुचे और काफी मशक्कत के बाद महाराज जी से मुलाकात हुई .
इस दौरान परिजनो ने महाराज जी को भला बुरा कहा। हो भी क्यो न किसी के भी लाडले को यौवन में ही कोई साधू बनाने की कोशिश करेंगा तो किसी का भी परिवान गुस्से में आ जायेगा।
फिलहाल नोंक-झोंक कर अनुपम मिश्रा के परिवार वाले अपने लाडले को घर लाये लेकिन अनुपम का मन तो बस साधना और महाराज जी लीन हो चुका था। परिजनो को आशंका थी कि परमपुज्यनीय डा. बिन्दु जी महाराज ने उनके लड़के पर कोई जादू-टोना कर दिये है।
सो क्या था क्षेत्र के जितने भी ओझा-सोखा और झाड़-फूंक कराने वाले को दिखाया गया लेकिन अनुपम के दिनचर्या में कोई सुधार देखने को नहीं मिला। इस दौरान कई डाक्टरो को दिखाया गया।
सभी अलग-अलग तरीके से अनुपम का ईलाज करने में जुटे रहे लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। रिश्तेदारो के कहने पर पिता श्री रामसेवक मिश्रा ने फैसला लिया कि अनुपम की शादी करा दी जाय शायद इससे कोई सुधार आ जाये लेकिन अनुपम के मन में तो सिर्फ साधू बनने की लालसा जगती रही। इस दौरान अनुपम परिवार वालो की चंगुल से कई बार भागने का प्रयास किया लेकिन सफलता नहीं मिल पाती थी। परिजनो को रो-रोकर बुरा हाल हो गया था कि आखिर अपने लाडले को कैसे ठीक करे। फिर क्या हुआ……
कैसे सानिध्य में आये परमपुज्यनीय डा. बिन्दु जी महाराज के
अनुपम मिश्रा के साधू बनने की यात्रा तमिलनाडू के कोयम्बटूर एयरपोर्ट से 2009 में शुरू हुई जब परमपुज्यनीय डा0 बिन्दु जी महाराज को किसी तरह गुस्से को शांत कर दिये। गुरूदेव ने अनुपम को अपना मोबाइल नम्बर दिया और एक हफ्ते बाद उन्हें फोन करने को कहा।
अनुपम मिश्रा महात्मा के क्रोध से इतने भयभीत हो गये थे कि फोन करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे एक दिन उन्होने हिम्मत कर फोन किया लेकिन बात नहीं हो पाई। अब तो अनुपम मिश्रा को रात-दिन परमपुज्यनीय डा0 बिन्दु महाराज की छवि दिखने लगी। कई दिनो तक वे सो नहीं पाये। बस मन में एक लालसा थी कि कैसे महात्मा के दर्शन हो जाये। फिर एक दिन महाराज जी का अचानक फोन आया और अनुपम मिश्रा को आदेश दिये कि गंगाजल लेकर वे एक हफ्ते के अन्दर आश्रम में आये। इस दौरान अनुपम सोचने लगे कि कही महाराज जी अपने पास बुला रहे कोई अनहोनी तो नहीं होगी!

रात दिन वे सोच में डूबे रहते। कई रात वे सो नहीं पाये। फिर एक दिन हिम्मत करके चोरी से 1 मई 2009 को गंगाजल लेकर महाराष्ट्र प्रान्त के नासिक जिले के स्थित महाराज जी के आश्रम बिन्दु धाम आश्रम पहुंच गये। लेकिन आश्रम पर पहरा इतना था कि कोई अनुपम को आश्रम के अन्दर जाने नहीं दे रहा था।

बाहर ही कई घंटो तक इंतजार करते रहे इस दौरान उन्होने कई बार महाराज जी को फोन किया लेकिन फोन नहीं उठा। उस समय अनुपम के मन में तरह-तरह के ख्याल मन मंे आते रहे कभी अच्छे तो कभी बुरे। कई घंटे बीत जाने के बाद महाराज जी फोन आया और आश्रम में कार्यरत लोगो से अनुपम को अन्दर आने के लिए बोला। अन्दर पहुंचकर अनुपम को महाराज जी के दिव्य दर्शन प्राप्त हुए और उन्होने अनुपम को आर्शीवाद दिया कहा कि तुम्हारा जीवन पारिवारिक नहीं है तुम जन्मजात साधू बनकर पैदा हुए हो और तुम्हे साधू रूप ही धारण करना होगा।
महाराज जी ने अपने कर्मचारियो से कहा कि अनुपम को आश्रम में कमरा दिया जाय। अनुपम बैग लेकर एक कमरे में चले गये। 3 दिनो तक वे आश्रम में कमरे में रहे इस दौरान वे काफी भयभीत थे। मन में ख्याल आ रहा था कि कही साधू उनकी बलि देने के लिए तो आश्रम में नहीं आया। कई बार उनके मन में ये भी ख्याल आया कि चलो आश्रम से भाग चलते है लेकिन कड़े पहरे के चलते उनके इस मंसूबे पर पानी फिर गया। फिर एक दिन महाराज ने अनुपम से कहा कि भागने की कोशिश मत करना क्योकि तुम्हारा जीवन साधू का है और यहीं से साधू बनने की यात्रा शुरू हो गई।
एक दिन रात को 1.30 बजे गुरूजी अनुपम को बुलाए और अपनी गाड़ी में बैठाकर शमशान लेकर गये। गाड़ी में अनुपम के अलावा महाराज जी और दो और साधू बैठे थे। शमशान पहुंचकर सभी लोग शव के पास बैठकर साधना करने लगे। इस दौरान अनुपम गाड़ी में बैठकर सारी प्रक्रिया देखते रहे अन्दर से काफी भयभीत अनुपम के मन में तरह-तरह के ख्याल मचलने लगे, कहीं साधू उनकी यहां बलि तो नहीं दें देगे। बहरआल किसी तरह तंत्र साधना समाप्त हुई और गुरू जी रोज अपने साथ अनुपम को साधरा कराने के लिए ले जाते थे। फिर उन्हें हरिद्वार से कोटद्वार ले जाया गया जहां 15 दिनो तक रात के समय साधना में लीन हो गये। 2009 से शुरू हुआ यह सिलसिला 2010 तक चलता रहा। इस दौरान वह पूरी तरह अपने साधू बनने की प्रक्रिया में ढल चुके थे।




