राष्ट्रीय संगोष्ठी में बोले बुद्धजीवी- भारतीय भाषाओं को एक साथ मिलकर चलना होगा
प्रयागराज। हिंदी विभाग एवं गांधी अध्ययन केंद्र, मणिबेन नानावटी महिला महाविद्यालय, मुंबई एवं राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में दि. 18 सितंबर को भाषा, साहित्य और संस्कृति पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित हुई।

यह संगोष्ठी हिंदी, सिंधी तथा मराठी भाषाओं के संदर्भ में हुई। संगोष्ठी का उद्घाटन किया महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के कार्याध्यक्ष डॉ. शीतला प्रसाद दुबे तथा केंद्रीय हिंदी निदेशालय के उप निदेशक श्री शैलेश बिडालिया ने। दुबे जी ने कहा कि हिंदी को अपने साथ सिंधी, मराठी तथा अन्य भाषाओं को लेकर चलना होगा।
तभी संस्कृति की उन्नति संभव है। बिडालिया जी ने कहा कि अब केंद्रीय हिंदी निदेशालय सिंधी भाषा को देवनागरी लिपि में लिखने की शुरुआत कर रहा है, जिससे भाषा को बचाया जा सके। अरबी लिपि में लिखी हुई सिंधी भाषा को समझने वाले बहुत कम लोग बचे हैं। संगोष्ठी में डॉ. जवाहर कर्णावट, श्रीमती सुधा अरोड़ा, प्रो. हूबनाथ, वसुधा सहस्रबुद्धे, रेखा देशपांडे, डॉ. प्रज्ञा शुक्ल आदि ने भी अपने विचार प्रस्तुत किए।
हिंदी विभाग मुंबई विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष डॉ. रतन कुमार पांडेय ने समापन सत्र में बोलते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति समावेशी रही है। हम अपनी भाषाओं को बचाएंगे तो साहित्य जीवित रहेगा। और साहित्य ही संस्कृति का वाहक होगा। समापन सत्र के मुख्य अतिथि साहित्य अकादमी के क्षेत्रीय सचिव और अनुवादक श्री प्रकाश भातंब्रेकर ने कहा कि तुलनात्मक अध्ययन का कार्य अनुवाद और आदान प्रदान के द्वारा सरल बन जाता है।
इस संगोष्ठी में लगभग 25 विद्वानों ने अपने विचार प्रस्तुत किए और करीब 100 लोगों ने प्रतिभागिता की। नानावटी महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. राजश्री त्रिवेदी ने संगोष्ठी में आए सभी अतिथियों का धन्यवाद दिया। गांधी अध्ययन केंद्र की संयोजक डॉ. सेजल शाह ने संगोष्ठी का कार्यवृत्त प्रस्तुत किया। संगोष्ठी का संयोजन किया हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉ. रवींद्र कात्यायन ने।



