श्राद्ध पक्ष में अपने कुल के पितरों का तर्पण पिंडदान क्रियाओं के द्वारा पितरों के ऋणों से मुक्त होता है-स्वामी महेशाश्रम

प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार )। अरैल स्थित नागेश्वर धाम मंदिर में आज जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी महेशाश्रम जी महाराज ने पत्रकारों को बताया वैदिक परंपराओं का पालन ही जीवन सुरक्षा चक्र का उपाय है ।
मनुष्य के सृजन के साथ वेदों में मनुष्य के जीवन जीने का उपाय एवं नियम बताया हुआ है। जन्म से ही मनुष्य चार रिणों से संयुक्त होकर जगत में जन्म लेता है ।इसलिए प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन के सभी कर्मों का पालन करते हुए इन चार रिणों से उरिण होने का प्रयत्न करना चाहिए ।पहला देव ऋण, दूसरा ऋषि ऋण, तीसरे मातृ ऋण एवं पितृ ऋण, जो भी धर्म पालन करने वाले मनुष्य नित्य देवताओं का आराधना करता है। तो वह देव ऋण से मुक्त होता है। गुरुजनों का सेवा करते हुए आशीर्वाद प्राप्त करता है। तो वह ऋषि ऋण से मुक्त होता है। माता पिता का आज्ञा का पालन करते हुए कुल धर्म का आचरण करने वाला मनुष्य मात्र ऋण एवं पित्र ऋण से मुक्त होता है।उसी प्रकार श्राद्ध पक्ष में अपने कुल के पितरों का तर्पण पिंडदान आदि क्रियाओं के द्वारा पितरों के ऋणों से मुक्त होता है।
स्वामी महेशाश्रम जी ने कहा मनुष्य जितना भी सत्कर्म व धर्म कर्म करें परंतु जब तक इन चारों रिणों से उरिण नहीं होता तब तक उस मनुष्य को वर्तमान जीवन में शांति एवं स्थिर सुख की प्राप्ति नहीं होती और वह मुक्ति पद का भी अधिकारी नहीं होता है ।इसलिए प्रत्येक मनुष्य को अपने पितरों का तर्पण श्राद्ध आदि कर्म अवश्य करना चाहिए यही सनातन धर्म एवं वैदिक परंपराओं का नियम है।
स्वामी महेशाश्रम जी अमावस्या का पर्व प्रयागराज में अतीत करते हुए अपने अनुयायियों को आशीर्वाद देते हुए पितरों के श्राद्ध के बारे में जानकारी दी।



