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काल स्वयं मुझसे डरा है, मैं काल से नहीं” – वीर सावरकर जी

( अनुराग शुक्ला ) प्रयागराज (अनुराग दर्शन समाचार )। पुण्य-तिथि पर “काल स्वयं मुझसे डरा है, मैं काल से नहीं” का उद्घोष करनेवाले वीर सावरकर जी का भावपूर्ण स्मरण किया गया । सावरकर जी सच्चे अर्थों में साहसी-निर्भीक वीर थे, जिन्होंने सदैव देश और भारतमाता के मान-सम्मान के बारे में चिन्तन-मनन के साथ-साथ उसके लिए प्रतिबद्ध रहे । यद्यपि इतिहास के गलत प्रस्तुतिकरण के कारण उनके अविस्मरणीय योगदान का अभी तक उचित रूप से मूल्यांकन नहीं हो पाया है, जो दुःखद है । उक्त विचार रहा लोकतंत्र सेनानी श्री नरेन्द्रदेव पाण्डेय का, जो आज वीर सावरकर जी की 56वीं पुण्य-तिथि के अवसर पर अलोपीबाग स्थित लोकमान्य तिलक लोक-सेवा ट्रस्ट के तत्त्वावधान में आयोजित स्मृति-गोष्ठी में व्यक्त किए ।
श्री पाण्डेय ने कहा कि जिन महापुरुषों का देश के राजनीतिक-सांस्कृतिक परिदृश्य में स्मरणीय योगदान रहा, उनमें वीर सावरकर जी अग्रणी मनीषी थे । ट्रस्ट की ओर से सुश्री स्मिता पौराणिक ने आगतजन का स्वागत करते हुए कहा कि ऐसे विषम समय में हम छोटे से आयोजन के माध्यम से वीरता के प्रतीक सावरकर जी को श्रद्धा-सुमन अर्पित कर पा रहे हैं, यह गणपति जी की परम दया है । सामाजिक सरोकारों से जुड़ी श्रीमती कंचन चन्द्रा के अनुसार वीर सावरकर भारतीय इतिहास के गौरव-पुरुष हैं और रहेंगे, उनका योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता है।
व्रतशील शर्मा ने वीर सावरकर जी का स्मरण बहुआयामी व्यक्तित्व-कर्तृत्व वाले महापुरुष के रूप में किया । स्वतंत्रता के महायज्ञ में उन्होंने बढ़-चढ़कर योगदान तो दिया ही, 1857 का स्वातंत्र्य-समर, हिन्दुत्व, कालापानी, हिन्दूराष्ट्र दर्शन, द सिक्स ग्लोरियस एपोक्स आफ इण्डियन हिस्ट्री आदि जैसी कालजयी रचनाएं उन्हें बौद्धिक रूप से सदैव अमर रखेंगी ।
वयोवृद्ध समाजसेवी श्री लालचन्द्र वाधवानी ने कहा कि विकास के साथ-साथ हमें अपनी विरासतों पर भी गौरव-बोध होना चाहिए । वीर सावरकर हर भारतीय के लिए गौरव-पुरुष हैं ।
आभार-ज्ञापन विकास केलकर ने किया । इस अवसर पर विधुभूषणराम तिवारी, विकास तिवारी, अनिल, श्याम शुक्ल सहित अन्य लोग उपस्थित रहे । गया । सावरकर जी सच्चे अर्थों में साहसी-निर्भीक वीर थे, जिन्होंने सदैव देश और भारतमाता के मान-सम्मान के बारे में चिन्तन-मनन के साथ-साथ उसके लिए प्रतिबद्ध रहे । यद्यपि इतिहास के गलत प्रस्तुतिकरण के कारण उनके अविस्मरणीय योगदान का अभी तक उचित रूप से मूल्यांकन नहीं हो पाया है, जो दुःखद है । उक्त विचार रहा लोकतंत्र सेनानी नरेन्द्रदेव पाण्डेय का, जो आज वीर सावरकर जी की 56वीं पुण्य-तिथि के अवसर पर अलोपीबाग स्थित लोकमान्य तिलक लोक-सेवा ट्रस्ट के तत्त्वावधान में आयोजित स्मृति-गोष्ठी में व्यक्त किए ।
श्री पाण्डेय ने कहा कि जिन महापुरुषों का देश के राजनीतिक-सांस्कृतिक परिदृश्य में स्मरणीय योगदान रहा, उनमें वीर सावरकर जी अग्रणी मनीषी थे । ट्रस्ट की ओर से सुश्री स्मिता पौराणिक ने आगतजन का स्वागत करते हुए कहा कि ऐसे विषम समय में हम छोटे से आयोजन के माध्यम से वीरता के प्रतीक सावरकर जी को श्रद्धा-सुमन अर्पित कर पा रहे हैं यह गणपति जी की परम दया है । सामाजिक सरोकारों से जुड़ी श्रीमती कंचन चन्द्रा के अनुसार वीर सावरकर भारतीय इतिहास के गौरव-पुरुष हैं और रहेंगे, उनका योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता है। व्रतशील शर्मा ने वीर सावरकर जी का स्मरण बहुआयामी व्यक्तित्व-कर्तृत्व वाले महापुरुष के रूप में किया । स्वतंत्रता के महायज्ञ में उन्होंने बढ़-चढ़कर योगदान तो दिया ही, 1857 का स्वातंत्र्य-समर, हिन्दुत्व, कालापानी, हिन्दूराष्ट्र दर्शन, द सिक्स ग्लोरियस एपोक्स आफ इण्डियन हिस्ट्री आदि जैसी कालजयी रचनाएं उन्हें बौद्धिक रूप से सदैव अमर रखेंगी ।
आभार-ज्ञापन विकास केलकर ने किया । इस अवसर पर विधुभूषणराम तिवारी, विकास तिवारी, अनिल, श्याम शुक्ल सहित अन्य लोग उपस्थित रहे ।

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